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Saturday, 31 October 2015

ज़िन्दगी एक किताब

एक किताब

कुछ अधजले पन्नों की

कुछ गायब पन्नों की

कुछ रंगहीन तस्वीरों की

एक किताब

नई जिल्द की चाह में

फिर से लिखे जाने की चाह में

नए नज़रिए से पढ़े जाने की चाह में

नयी बुक सेल्फ की चाह में

एक नये शब्दकोश की चाह में

एक किताब

जिसमें कुछ आदर्श

जिसमें कुछ जज्बात

बहुत से रहस्य

बहुत सा रोमांच

एक किताब

आज मैंने पढ़ी

एक जिदंगी

आज मैंने पढ़ी।।

मनीषा शर्मा~


  1. that's beautiful....the picture contrasts the play on 'newness' in your poem.

    1. Thank you Sunaina... In this poem I've tried to tell a storie of two people of different age who face it all even in today's date.

  2. Waiting for a new's pathetic that it is still rampant in India...Beautifully expressed anyway...